National Sports News: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वर्षों की मेहनत और समर्पण से विश्व कप पर कब्जा जमाया. यह जीत सिर्फ ट्रॉफी नहीं बल्कि उन सैकड़ों बेटियों की कहानी है जिन्होंने उधार के बैट, पैड, खुद सिले यूनिफॉर्म और बिना रिजर्व डिब्बों के सफर से शुरुआत की.
साल 1976 में महेंद्र कुमार शर्मा ने लखनऊ में विमेंस क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया की नींव रखी. तब न फंडिंग थी न सुविधाएं. डायना एडुल्जी, शांता रंगास्वामी, संध्या अग्रवाल जैसी खिलाड़ियों ने अपने दम पर रास्ता बनाया. 1976 में बेंगलुरु में वेस्टइंडीज के खिलाफ पहला टेस्ट खेला गया. दर्शक कम थे लेकिन खिलाड़ियों का जज्बा बुलंद.
2005 में मिताली राज की कप्तानी में टीम विश्व कप फाइनल तक पहुंची. झूलन गोस्वामी, अंजुम चोपड़ा ने संसाधनों की कमी के बावजूद इतिहास रचा. 2006 में बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को अपनाया. 2017 का लॉर्ड्स फाइनल हार गया लेकिन दुनिया ने इन बेटियों को पहचाना.
बीसीसीआई सचिव जय शाह की समान वेतन नीति और विमेंस प्रीमियर लीग ने नई क्रांति लाई. छोटे कस्बों तक क्रिकेट पहुंचा और 2025 में सपना पूरा हुआ. कोच अमोल मजूमदार के अब या कभी नहीं मंत्र और पिछले 18 महीनों मेहन ने चमत्कार किया. हरमनप्रीत, स्मृति, जेमिमा, दीप्ति ने टीम को एकजुट रखा. पूर्व स्पिनर नीतू डेविड ने कहा कि यह जीत विश्वास की है. अब लड़कियां रिकॉर्ड के लिए खेलेंगी.
यह जीत महिला क्रिकेट में समानता और अवसरों की नई मिसाल है. संघर्ष से शिखर तक की यात्रा लाखों बेटियों को प्रेरित करेगी. बीसीसीआई की नीतियां और डब्ल्यूपीएल ने आधार मजबूत किया है. अब निरंतरता और ग्रासरूट विकास पर जोर जरूरी ताकि विश्व कप जीत परंपरा बने.