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  • 2025-11-08

Big National News: मौजूदा सरकार में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कितना मजबूत? पत्रकारों की हत्या और पत्रकारों की सुरक्षा पर उठते सवाल

Big National News: देश में लगातार हो रही पत्रकारों की हत्या और उन पर बढ़ते हमलों ने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. साल 2025 में अब तक पांच पत्रकारों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है, जिनमें छत्तीसगढ़ के मुकेश चंद्राकर, उत्तर प्रदेश के राघवेंद्र बाजपेयी, हरियाणा के धर्मेंद्र सिंह चौहान, उत्तराखंड के राजीव प्रताप और ओडिशा के सीएच नरेश कुमार शामिल हैं.

इनकी मौत के बाद भी नहीं जागी सरकार
छत्तीसगढ़ के फ्रीलांस जर्नलिस्ट मुकेश चंद्राकर एक जनवरी को लापता हो गए थे. दो दिन बाद उनका शव उसी ठेकेदार के सेप्टिक टैंक से मिला जिसके खिलाफ उन्होंने भ्रष्टाचार की खबर चलाई थी. उत्तर प्रदेश के सीतापुर में आठ मार्च को पत्रकार राघवेंद्र बाजपेयी की गोली मारकर हत्या कर दी गई. हरियाणा के झज्जर में आरटीआई एक्टिविस्ट और पत्रकार धर्मेंद्र सिंह चौहान को उनके घर के पास गोली मार दी गई. सितंबर में यूट्यूब पत्रकार राजीव प्रताप की लाश एक डैम से बरामद हुई. जुलाई में ओडिशा के टाइम्स ओड़िया पोर्टल से जुड़े पत्रकार नरेश कुमार की हत्या धारदार हथियारों से की गई थी.

पत्रकारों पर हो रहे अपराधों में दंड मुक्ति कब होगी समाप्त 
संयुक्त राष्ट्र ने साल 2014 में दो नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में दंड मुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था. लेकिन यह सवाल आज भी जस का तस है कि पत्रकारों पर हो रहे अपराधों में दंड मुक्ति कब समाप्त होगी.

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. पर अब यह पेशा लगातार जोखिम से जुड़ता जा रहा है. कम वेतन, असुरक्षित कार्य वातावरण, निरंतर धमकियां और सत्ता से टकराव पत्रकारों के लिए आम हो गया है. पिछले एक दशक में देश में पत्रकारों पर हमलों और हत्याओं के मामले तेजी से बढ़े हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कई मामलों में स्वतः संज्ञान लिया 
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हाल ही में केरल, मणिपुर और त्रिपुरा में पत्रकारों पर हुए हमलों का स्वतः संज्ञान लिया है और तीनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से रिपोर्ट मांगी है. इन हमलों में त्रिपुरा में राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान पत्रकार पर लाठी और धारदार हथियारों से हमला हुआ था. मणिपुर में एक पत्रकार को पुष्प उत्सव की कवरेज के दौरान एयर गन से दो बार गोली मारी गई. वहीं केरल में भीड़ ने एक पत्रकार पर हमला कर दिया.

1992 से अब तक दुनियाभर में 1400 से अधिक पत्रकारों की हत्या हुई: रिपोर्ट
“कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स” की रिपोर्ट के अनुसार 1992 से अब तक दुनियाभर में 1400 से अधिक पत्रकारों की हत्या हुई है. इनमें से 890 मामलों में अब तक किसी को सजा नहीं मिली. भारत में 20 वर्षों में 1668 पत्रकारों की हत्या हुई है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत 2025 के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में 159वें स्थान पर है.

75 फीसदी महिला पत्रकार ऑनलाइन हिंसा का होती हैं शिकार
महिला पत्रकारों की स्थिति और भी भयावह है. यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि 75 फीसदी महिला पत्रकार ऑनलाइन हिंसा का शिकार होती हैं. महिला पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा के वैश्विक संकट का एक प्रतीकात्मक मामला भारत में देखा गया जहां कई महिला पत्रकारों को 2021 में “सुली डील्स” ऐप पर और फिर 2022 में “बुल्ली बाई” ऐप पर नीलामी के लिए सूचीबद्ध किया गया था. बेंगलुरु की गौरी लंकेश की 2017 में हुई हत्या और 2008 में सौम्या विश्वनाथन की हत्या इस बात की मिसाल हैं कि सच्चाई लिखना यहां कितना खतरनाक हो चुका है.

भारत में पत्रकारों की हत्याओं की सूची लंबी
भारत में पत्रकारों की हत्याओं की सूची लंबी है. 2015 में फ्रीलांसर जगेंद्र सिंह, 2016 में करुण मिश्रा और रंजन राजदेव, 2018 में संदीप शर्मा, 2020 में शुभम मणि त्रिपाठी और 2022 में सुभाष महतो की हत्या इसी श्रेणी में आती है. अधिकांश पत्रकार अवैध खनन, माफिया या भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें कर रहे थे.

मोदी के सत्ता में आने के बाद मीडिया एक अनौपचारिक आपातकाल के दौर में: रिपोर्ट
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की मीडिया एक अनौपचारिक आपातकाल के दौर में है. सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को मुकदमे, धमकी और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है. महिला पत्रकारों के लिए काम का माहौल अब भी असुरक्षित है. संस्थानों के अंदर यौन उत्पीड़न के मामले अक्सर दबा दिए जाते हैं. 

पत्रकारों के संगठनों की खामोशी भी सवालों के घेरे में है. रोजगार की असुरक्षा, हमलों में न्याय न मिलना और सत्ता से संघर्ष जैसे मुद्दों पर इन संगठनों की भूमिका बेहद कमजोर रही है. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया जैसे कुछ संस्थान समय-समय पर आवाज उठाते हैं, पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.

पत्रकारों की सुरक्षा का कोई विशेष कानून नहीं
देश में पत्रकारों की सुरक्षा का कोई विशेष कानून नहीं है. अभी ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता या यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत ही कार्रवाई होती है. ऐसे में सवाल यही है कि जब सच्चाई को लिखने वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा. 

पत्रकारों पर बढ़ते हमले और उनकी हत्याएं लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं. सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा पर उनकी गंभीरता नहीं दिखती. दंड मुक्ति की परंपरा ने अपराधियों को और निर्भीक बनाया है. महिला पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा और ट्रोलिंग ने नए खतरे पैदा किए हैं. प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर रही है. यह समय है जब पत्रकारों की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह गंभीरता से लिया जाए क्योंकि जब सच लिखने वाले चुप हो जाते हैं, तो समाज भी अंधेरे में डूब जाता है.
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