National Press Day: हर साल 16 नवंबर को देश भर में राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाया जाता है. यह दिन भारतीय प्रेस परिषद के उस ऐतिहासिक पल की याद दिलाता है जब उसने 16 नवंबर 1966 को स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस की रक्षा के लिए अपना कामकाज शुरू किया था. इस दिन का उद्देश्य पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करना और निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना है.
भारतीय भाषाओं के अखबारों पर शिकंजा कसने की कोशिश
राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का एक ऐसा अध्याय याद किया जाता है जिसने अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के सामने झुकने से इनकार कर दिया था. बात 1878 की है. उस समय देश में वायसराय लॉर्ड लिटन की सरकार थी जिसने वर्नाकुलर प्रेस एक्ट लागू कर भारतीय भाषाओं के अखबारों पर शिकंजा कसने की कोशिश की. यह कानून अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखने वाले अखबारों को सीधे निशाने पर लेने के लिए बनाया गया था. इस एक्ट के तहत मजिस्ट्रेट को अधिकार था कि वह किसी भी देशी भाषा के अखबार से यह लिखित शपथ ले कि वह सरकार विरोधी सामग्री प्रकाशित नहीं करेगा. उल्लंघन की स्थिति में सुरक्षा राशि जब्त की जा सकती थी और इसके खिलाफ कोई अपील भी नहीं की जा सकती थी. अंग्रेजी अखबार इस कानून से बाहर रखे गए थे.
इस कानून की चपेट में अमृत बाजार पत्रिका नाम का बंगाली अखबार भी आ गया. शिशिर कुमार घोष और उनके भाइयों द्वारा शुरू किया गया यह अखबार अपनी तीक्ष्ण आलोचनाओं और निर्भीक लेखन के लिए प्रसिद्ध था. एक्ट लागू होने के बाद संपादकों के सामने दो ही विकल्प थे. या तो वे सरकार के दबाव में झुकते या फिर भारी जुर्माने और अखबार बंद होने की आशंका को स्वीकार करते.
लेकिन अमृत बाजार पत्रिका ने तीसरा रास्ता चुना. शिशिर कुमार घोष ने रातोंरात अखबार की भाषा बदल दी. अखबार अगले ही दिन बंगाली के बजाय अंग्रेजी में छपा. अंग्रेजी भाषा में सरकार की आलोचना जारी रखी और उसी कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर ब्रिटिश शासन की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए. यह कदम अंग्रेजी हुकूमत के लिए अप्रत्याशित था. इसी घटना ने अमृत बाजार पत्रिका को भारतीय पत्रकारिता में साहस और प्रतिबद्धता का प्रतीक बना दिया.
राष्ट्रीय प्रेस दिवस का इतिहास यही बताता है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं बल्कि सत्ता के दमन के खिलाफ खड़े होने का साहस भी है. अमृत बाजार पत्रिका की कहानी इस बात का प्रमाण है कि जब भी पत्रकारिता पर संकट आया है, उसने नए रास्ते खोजकर लोकतंत्र की सांसें बरकरार रखी हैं. आज भी जब प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस जारी है, यह घटना याद दिलाती है कि सच्ची पत्रकारिता कभी दबाव में नहीं झुकती और स्वतंत्र विचार ही लोकतंत्र की असली धरोहर होते हैं.