Big News: आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे घने जंगलों में सोमवार को सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में कुख्यात नक्सली कमांडर मादवी हिडमा को उसकी पत्नी राजे के साथ ढेर कर दिया गया. यह मुठभेड़ अल्लूरी सीताराम राजू और सुकमा जिलों की सीमा पर विशेष इनपुट के आधार पर चलाए गए आपरेशन के दौरान हुई. सुरक्षाबलों ने इस कार्रवाई में कुल छह नक्सलियों को मार गिराया.
कौन था हिडमा
करीब 43 वर्ष का हिडमा पिछले दो दशक से सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा. वह पीएलजीए की सबसे सक्रिय और ताकतवर बटालियन नंबर एक का प्रमुख था. साथ ही सीपीआई माओवादी की केंद्रीय समिति का सबसे युवा सदस्य माना जाता था. उसके पास जंगलों में गुरिल्ला युद्ध की गहरी रणनीतिक समझ थी और वह तकनीकी निगरानी से बच निकलने की क्षमता के कारण सबसे खतरनाक चेहरों में शामिल था. सुकमा के पुवर्ती गांव का निवासी हिडमा किशोरावस्था में ही माओवादी संगठन से जुड़ गया था. समय के साथ उसने संगठन में तेजी से स्थान बनाया और टॉप स्ट्रैटेजिस्ट बनकर उभरा.
कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड
हिडमा पर कम से कम 26 बड़े नक्सली हमलों की साजिश रचने और नेतृत्व करने का आरोप था. 2013 में दरभा घाटी में हुए हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं समेत 27 लोगों की हत्या के मामले में वह मुख्य साजिशकर्ता था. 2017 में सुकमा में सीआरपीएफ पर हुए हमले में भी उसने नेतृत्व किया था जिसमें 25 जवान शहीद हुए थे. उसकी गिरफ्तारी पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था.
मुठभेड़ कैसे हुई
बीते दिनों सुरक्षा एजेंसियों के पास हिडमा की मूवमेंट को लेकर पुख्ता सूचना थी. इसके बाद विशेष टीमों ने जंगल में कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन शुरू किया. घेराबंदी का आभास होते ही नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी. जवाबी कार्रवाई में हिडमा और उसकी पत्नी दोनों मारे गए. उसकी पत्नी भी संगठन में सक्रिय थी और कई ऑपरेशनों में शामिल रही थी.
माओवादी संगठन को बड़ा नुकसान
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार हिडमा की मौत दक्षिण बस्तर में माओवादियों के लिए बड़ा झटका है. क्षेत्र में संगठन की पकड़ बनाए रखने में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी. उसके मारे जाने के बाद नक्सली नेटवर्क कमजोर पड़ेगा और सुरक्षा बलों को आगे की कार्रवाई में बढ़त मिलेगी.
हिडमा का सफाया नक्सल विरोधी अभियान की अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा रहा है. यह ऑपरेशन सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय और रणनीतिक तैयारी का संकेत देता है. हालांकि संगठन की कमान किसी नए चेहरे के हाथ में जा सकती है, लेकिन हिडमा जैसा खतरनाक और रणनीतिक तौर पर दक्ष कमांडर तैयार करना माओवादियों के लिए आसान नहीं है. आने वाले महीनों में दक्षिण बस्तर में नक्सली गतिविधियों में कमी देखने की संभावना है, लेकिन चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा सकती.