Adityapur Big Breaking: शहर को चमकाने की कवायद तेज है. सड़कों पर रंग-रोगन किया गया, अतिक्रमण हटाया गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन से पहले आदित्यपुर को सजाया संवारा जा रहा है. लेकिन इस चमक के पीछे एक स्याह सच्चाई भी है, जिसे देखने वाला कोई नहीं. आदित्यपुर का वही फुटबॉल मैदान, जहां बच्चे खेलने आते हैं, आज लापरवाही, गंदगी और असामाजिक गतिविधियों का प्रतीक बन चुका है. सवाल यह है कि व्यवस्था की नजर आखिर कहां तक जाती है और कहां आकर ठहर जाती है.
आंधी तूफान की वह घटना जो आज भी सवाल बनकर खड़ी है
23 मई 2023 को आदित्यपुर के इसी एस टाइप फुटबॉल मैदान में एक दर्दनाक हादसा हुआ था. आंधी तूफान और बारिश से बचने के लिए छह बच्चों ने मैदान से सटे एक पेड़ के नीचे शरण ली. इसी दौरान मैदान की दीवार से सटा पेड़ गिर पड़ा और 6 बच्चे उसके नीचे दब गए. तीन बच्चों को आनन-फानन में टाटा मुख्य अस्पताल ले जाया गया. इलाज के दौरान एक बच्चे की मौत हो गई. उस दिन अफरा तफरी मच गई थी. आज दो साल बाद भी वही दीवार गिरी हुई है और वही मैदान उसी हाल में खड़ा है.
नशेड़ियों का अड्डा बना फुटबॉल मैदान
आदित्यपुर का यह मैदान अब खेल से ज्यादा नशे के लिए जाना जा रहा है. दिनदहाड़े शराब, गांजा और अन्य मादक पदार्थों का सेवन यहां खुलेआम होता है. मैदान की सीढ़ियों पर शराब की खाली बोतलें पड़ी मिलती हैं. मैदान में बने एक हॉल की छत पर शराब की बोतलें फोड़ी जा रही हैं. यह हालात किसी एक दिन के नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से यही स्थिति बनी हुई है.
खेलने लायक नहीं बचा मैदान
जिस मैदान में बच्चे फुटबॉल और क्रिकेट खेलने आते थे, वह अब खुद खतरा बन चुका है. जगह-जगह गड्ढे हैं, कचरा बिखरा हुआ है और टूटी दीवारें आज भी वैसे ही पड़ी हैं. बच्चों को मजबूरी में इसी मैदान में खेलना पड़ता है. हर खेल के साथ उनके सिर पर हादसे का डर भी मंडराता रहता है. सवाल उठता है कि क्या फुटबॉल मैदान ऐसा होता है?
सफाई अभियान सिर्फ वीआईपी रास्तों तक सीमित
राष्ट्रपति के आगमन को लेकर आदित्यपुर नगर निगम, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन हरकत में है. जिन रास्तों से राष्ट्रपति गुजरेंगी, वहां साफ-सफाई और सजावट युद्ध स्तर पर हो रही है. गरीबों की दुकानों और ठेलों को हटाया गया है. लेकिन फुटबॉल मैदान जैसे सार्वजनिक स्थलों की सुध लेने वाला कोई नहीं. क्या असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो रही क्योंकि वे वीआईपी रास्ते में नहीं आते.
मैदानों को पार्क बना दिया गया, खेल सिमटते गए
आदित्यपुर में पहले जहां कई मैदान थे, वहां अब पार्क बना दिए गए हैं. पार्कों में क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेल संभव नहीं हैं. ऐसे में यह मैदान बच्चों के लिए इकलौता विकल्प रह गया है. जब यही मैदान बदहाली का शिकार हो जाए, तो बच्चों के खेलने का अधिकार भी छिन जाता है.
सरकारी पैसे का हिसाब कौन देगा?
हर साल खेल और विकास के नाम पर बजट खर्च होता है. नगर निगम और प्रशासन की योजनाएं कागजों में चलती रहती हैं. लेकिन मैदान की हालत देखकर सवाल उठता है कि सरकारी पैसा आखिर जा कहां रहा है. न सुरक्षा दीवार बनी, न नियमित सफाई हुई और न ही असामाजिक तत्वों पर लगाम लगी.
सिस्टम की प्राथमिकताओं का आईना है आदित्यपुर का फुटबॉल मैदान
आदित्यपुर का फुटबॉल मैदान सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि सिस्टम की प्राथमिकताओं का आईना है. जहां वीआईपी मूवमेंट है, वहां चमक है. जहां आम बच्चों की जिंदगी दांव पर है, वहां खामोशी है. प्रशासनिक सक्रियता और जमीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है. जनता का सवाल साफ है कि क्या सफाई और कानून व्यवस्था सिर्फ खास मौकों और खास लोगों के लिए है? आखिर कब तक जनता को हादसों से जूझना होगा? इसका जवाब प्रशासन को अब देना चाहिए.