Adityapur News: आदित्यपुर नगर निगम ने चौक चौराहों पर लोगों की सुविधा के लिए लाखों रुपये खर्च कर मॉड्यूलर शौचालयों का निर्माण कराया था. दावा था कि इससे राहगीरों, मजदूरों और स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिलेगी. लेकिन आकाशवाणी के पास बना मॉड्यूलर शौचालय आज नगर निगम की कार्यशैली पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा है. इसके साथ ही लगभग सभी मॉड्यूलर शौचालय की स्थिति भी ऐसी ही हैं. निर्माण के बाद यह शौचालय कुछ ही दिनों तक संचालित हो पाया और फिर धीरे-धीरे बदहाली का शिकार होता चला गया.
कुछ दिन चली सुविधा, फिर सिस्टम हुआ गायब
स्थानीय लोगों के मुताबिक शौचालय बनने के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक इसका इस्तेमाल हुआ. इसके बाद न तो नियमित सफाई हुई और न ही किसी ने इसकी देखरेख की जिम्मेदारी ली. इसी बीच असामाजिक तत्वों ने शौचालय में हाथ साफ कर दिया. नल, फिटिंग और अन्य सामान या तो तोड़ दिए गए या गायब हो गए.
आज हालत ऐसी कि इमरजेंसी में भी कोई न जाए
शौचालय की मौजूदा स्थिति इतनी खराब है कि कोई व्यक्ति इमरजेंसी में भी वहां जाने से कतराए. न पानी की व्यवस्था है, न साफ सफाई और न ही बुनियादी सुविधा. शौचालय के आसपास कचरे का अंबार लगा हुआ है. सवाल उठता है कि जब किसी को अचानक जरूरत पड़ जाए तो वह आखिर कहां जाए.
सालों से जस की तस स्थिति
यह हालात किसी एक-दो महीने के नहीं हैं. विगत 5 सालों से यह मॉड्यूलर शौचालय इसी हालत में खड़ा है. न नगर निगम ने इसे दोबारा दुरुस्त कराया और न ही किसी अफसर ने इसकी सुध ली. कागजों में यह सुविधा आज भी मौजूद है, लेकिन जमीन पर यह सिर्फ एक बदहाल ढांचा बनकर रह गया है.
सरकारी पैसे की जिम्मेदारी कौन लेगा
लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए शौचालय अगर उपयोग के लायक ही नहीं हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है. निर्माण के बाद रखरखाव क्यों नहीं किया गया. असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इन सवालों के जवाब न निगम देता है और न ही संबंधित अधिकारी.
नगर निकाय चुनाव से पहले बड़ा सवाल
आने वाले नगर निकाय चुनाव से पहले यह मुद्दा लोगों के बीच है. जब बुनियादी सुविधा का यह हाल है, तो आखिर किस मुंह से जनता से वोट मांगा जाएगा. जिन अफसरों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी थी, उन्होंने अपना काम सही तरीके से क्यों नहीं किया, यह सवाल अब आम लोग पूछ रहे हैं.
सिस्टम की लापरवाही की पहचान बन चुका है आदित्यपुर का यह मॉड्यूलर शौचालय
आदित्यपुर का यह मॉड्यूलर शौचालय सिर्फ एक खराब ढांचा नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही की पहचान बन चुका है. योजनाएं बनती हैं, पैसे खर्च होते हैं, लेकिन निगरानी और जवाबदेही गायब रहती है. मौजूदा अफसरों के लिए यह सीधा सवाल है कि जब सालों तक ऐसी स्थिति बनी रही, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई. अगर बुनियादी सुविधाएं ही इस हाल में रहेंगी, तो विकास के दावे कितने खोखले हैं, इसका जवाब अब जनता चाहती है.