विडंबना यह है कि जिस देश में शिक्षा को मंदिर कहा जाता है, उसी देश में बच्चे ज्ञान की पहली सीढ़ी चढ़ने से पहले सड़ते कचरे, असहनीय दुर्गंध और आवारा कुत्तों के खौफनाक पहरे से होकर गुजरने को मजबूर हैं। सवाल यह है—क्या यही है हमारा विकास।
दशकों से चली आ रही यह बदहाली सिर्फ एक सड़क की कमी नहीं, बल्कि झारखंड की उस प्रशासनिक विफलता का जीवंत प्रमाण है, जो अलग राज्य बनने के वर्षों बाद भी कतरास की इस बस्ती को बुनियादी मानवाधिकार तक नहीं दे सकी।
पक्की सड़क और स्ट्रीट लाइट के लिए आज भी मोहताज हैं
यह महज़ एक मोहल्ले की समस्या नहीं, बल्कि उस वोट बैंक की त्रासदी है, जिसका इस्तेमाल सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए तो किया गया, लेकिन बदले में उसे सिर्फ आश्वासनों का झुनझुना पकड़ा दिया गया। इसी विद्यालय परिसर से जुड़े लगभग 1500 मतदाता हर चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सरकारें बनाते हैं, लेकिन अपनी ही गली में पक्की सड़क और स्ट्रीट लाइट के लिए आज भी मोहताज हैं।
जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता का आलम यह है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, मगर जीत का सेहरा बंधते ही जनता और जनता का रास्ता उनकी प्राथमिकताओं से बाहर हो जाता है।
बदहाली भी फाइलों के ढेर में दफन
अब जब धनबाद नगर निगम चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और 23 फरवरी को मतदान होना है, सियासी सरगर्मी एक बार फिर तेज है। लेकिन असली सवाल यह है, क्या 27 फरवरी को चुने जाने वाले नए पार्षद और मेयर वार्ड संख्या एक को इस नरकीय स्थिति से निजात दिला पाएंगे, या फिर यह बदहाली भी फाइलों के ढेर में दफन कर दी जाएगी।
नागरिक गरिमा को कचरे के ढेर में
स्थानीय निवासियों का आक्रोश अब उबाल पर है। उन्हें अब भाषण नहीं, बल्कि धरातल पर पक्की सड़क और अंधेरे को चीरती स्ट्रीट लाइट चाहिए। अगर इस बार भी व्यवस्था की नींद नहीं टूटी, तो यह सिर्फ बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा, बल्कि उस लोकतंत्र का खुला अपमान होगा—जहाँ वोट तो लिए जाते हैं, लेकिन नागरिक गरिमा को कचरे के ढेर में छोड़ दिया जाता है।