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  • 2026-02-18

Editorial: मीडिया का “मंथन”, पतियों का जमावड़ा और ठगी जा रही जनता

Editorial(Rishabh Rahul): जमशेदपुर के मानगो नगर निगम और जुगसलाई नगर परिषद् के चुनावी समर में इन दिनों “सशक्तिकरण” का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है. मेयर और अध्यक्ष की कुर्सियां महिलाओं के लिए आरक्षित क्या हुईं, रसूखदारों ने अपनी पत्नियों को सियासी ढाल बनाकर मैदान में उतार दिया है. शहर में चर्चा विकास की नहीं, बल्कि इस बात की है कि “मेयर पति” बनने की होड़ में कौन कितना आगे है. विडंबना देखिए, जिस शहर को मुख्यमंत्री मेट्रो के सपने दिखा रहे हैं, वहां की भावी "नगर माताएं" मीडिया के एक साधारण सवाल पर बगल में खड़े पति का मुंह ताकने लगती हैं.

“मंथन” के नाम पर प्रत्याशियों की जगह प्रत्याशी पति को बुलाया गया
सबसे बड़ा तमाशा तो मीडिया के उन मंचों पर दिख रहा है, जहां “मंथन” के नाम पर प्रत्याशियों की जगह प्रत्याशी पति को बुलाया जाता है. नियमतः सवाल महिला प्रत्याशियों से होने चाहिए, लेकिन वहां नजारा किसी “पति सम्मेलन” जैसा था. मीडिया संस्थान भी अपनी जिम्मेदारी भूलकर पतियों का जमावड़ा लगवा रहे हैं, जहां माइक थामे “मेयर पति” अपनी विद्वत्ता झाड़ते हैं और असली प्रत्याशी एक मूक दर्शक की तरह बैठी रहती हैं. मीडिया को यह समझना होगा कि जनता को प्रत्याशी का विजन जानना है, उसके पति की “दबंगई” या “रसूख” नहीं. पतियों को इस तरह मंच देना लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक है.

आरक्षित सीट पर भी पुरुष “प्रॉक्सी” बनकर सत्ता हथियाने की फिराक में
पूर्व मंत्री, व्यापरियों और रसूखदारों की ये पत्नियां चुनाव मैदान में तो हैं, लेकिन इनकी अपनी कोई राजनीतिक पहचान या मौलिक विचार नहीं दिखते. जब ये खुद अपने अधिकारों और कर्तव्यों से अनभिज्ञ हैं, तो जनता की समस्याओं का समाधान कैसे करेंगी? चुनाव प्रचार के दौरान यह साफ दिख रहा है कि नगर सरकार का रिमोट किसके हाथ में रहने वाला है. यह पुरुष प्रधान मानसिकता का ही चरम है कि आरक्षित सीट पर भी पुरुष “प्रॉक्सी” बनकर सत्ता हथियाने की फिराक में हैं. वे अपनी पत्नियों का सहारे लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोंट रहे हैं.

जनता की उम्मीदें और रसूख की नुमाइश
जमशेदपुर जैसे बौद्धिक शहर में मतदाताओं के सामने संकट यह है कि वे वोट किसे दें? उस चेहरे को जो पोस्टर पर है, या उस दिमाग को जो पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित कर रहा है? जनसुविधाएं और नगर विकास के गंभीर मुद्दे इन “मेयर पतियों” के अहंकार और रसूख के नीचे दब गए हैं. अगर चुनाव जीतने के बाद भी फैसलों के लिए पतियों का ही “मंथन” होना है, तो फिर महिला आरक्षण के इस ढोंग की जरूरत ही क्या थी? शहर की सरकार को “रिमोट” से चलाने की यह कोशिश जनता के साथ सीधी धोखाधड़ी है.

अगले पांच साल विकास नहीं, बल्कि पतियों का “मंथन” ही शहर की नियति बनेगा
निकाय चुनाव में महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में लाना था, लेकिन जमशेदपुर में यह “पारिवारिक सत्ता” के विस्तार का जरिया बन गया है. मीडिया द्वारा पतियों को तरजीह देना इस गलत परंपरा को खाद-पानी दे रहा है. जब तक सीधे प्रत्याशियों से कड़े सवाल नहीं होंगे, तब तक ये “प्रॉक्सी उम्मीदवार” अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे. अगर जनता ने इस बार भी “चेहरे” के पीछे छिपे “रिमोट” को वोट दिया, तो अगले पांच साल विकास नहीं, बल्कि पतियों का “मंथन” ही शहर की नियति बनेगा.
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