Editorial: न्याय की उम्मीद लेकर सालों से लड़ रही उन्नाव रेप कांड की पीड़िता के लिए एक बार फिर व्यवस्था ने गहरा जख्म दिया है. दिल्ली हाईकोर्ट से दोषी पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत ने सिर्फ एक पीड़िता को नहीं, बल्कि पूरे समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब न्याय सत्ता और प्रभाव के तराजू पर तौला जाएगा.
“जिंदगी खत्म करने तक का विचार”
उन्नाव रेप कांड की पीड़िता ने पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है. दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा पर रोक और जमानत दिए जाने से पीड़िता गहरे आघात में है. पीड़िता का कहना है कि इस फैसले ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था और उन्होंने एक पल के लिए अपनी जिंदगी खत्म करने तक का विचार कर लिया था. हालांकि परिवार और न्याय की लड़ाई ने उन्हें दोबारा खड़ा होने की ताकत दी.
अदालतों में एक सप्ताह की छुट्टियां होने वाली हैं शुरू
पीड़िता ने हाईकोर्ट के फैसले की टाइमिंग पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि सेंगर को उस वक्त राहत दी गई, जब अदालतों में एक सप्ताह की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं. उन्होंने यह भी कहा कि उनके चाचा, जिन्होंने किसी की हत्या या बलात्कार नहीं किया, उन्हें आज तक पेरोल तक नहीं मिल सकी है, जबकि एक दोषी को कानून से राहत मिल रही है.
सेंगर के इशारे पर गवाह वीरेंद्र यादव पर गुंडा एक्ट लगाया गया
पीड़िता ने आरोप लगाया है कि कुलदीप सिंह सेंगर जेल में रहते हुए भी पुलिस और प्रशासन पर अपना दबदबा बनाए हुए है. उनके मुताबिक सेंगर के इशारे पर गवाह वीरेंद्र यादव पर गुंडा एक्ट लगाया गया और उन्हें करीब 50 दिनों तक जेल में प्रताड़ित किया गया. पीड़िता ने यह भी दावा किया कि इस पूरे मामले में बृजभूषण शरण सिंह का संरक्षण सेंगर को मिल रहा है. उनका कहना है कि यह लड़ाई अब सिर्फ एक केस की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के खिलाफ है.
पुलिस प्रशासन सत्ता के दबाव में काम कर रहा
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में जब पीड़िता और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना इंडिया गेट पर प्रदर्शन के लिए पहुंचे, तो वहां पुलिसिया कार्रवाई की गई. पीड़िता ने आरोप लगाया कि उनके शरीर में करीब 250 टांके लगे होने के बावजूद पुलिस ने उन्हें जबरन उठाया और बस में फेंक दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों से भी वंचित किया गया और पुलिस प्रशासन सत्ता के दबाव में काम करता नजर आया.
क्या न्याय व्यवस्था अब सत्ता की सांठगांठ से चलेगी?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या न्याय व्यवस्था अब सत्ता की सांठगांठ से चलेगी. संसद में भारत माता की जय और वंदेमातरम पर घंटों चर्चा होती है, लेकिन बलात्कार और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस से संसद अक्सर खामोश रहती है. नारे ऊंचे हैं, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा पर राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर दिखती है.
2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव
आने वाले समय में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि सत्ता को बहुबलियों की जरूरत पड़ेगी. बिहार चुनाव में बाहुबल का इस्तेमाल कैसे होता है, यह देश देख चुका है. मोकामा से नवनिर्वाचित विधायक अनंत सिंह आज भी दुलारचंद यादव हत्याकांड के आरोप में जेल में हैं, लेकिन राजनीतिक समीकरणों में ऐसे नाम बार-बार उभरते रहते हैं. इससे यह संदेश जाता है कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है.
सख्त और निष्पक्ष फैसला नहीं हुआ, तो न्याय से जनता का भरोसा उठना तय
उन्नाव रेप कांड सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह भारत की न्याय व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन चुका है. एक दोषी को जमानत मिलना और पीड़िता का बार-बार सड़क पर उतरकर न्याय मांगना यह दिखाता है कि सिस्टम किस ओर झुका हुआ है. जब राजनीति, पुलिस और न्याय व्यवस्था पर सवाल एक साथ खड़े होने लगें, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं. अगर ऐसे मामलों में समय रहते सख्त और निष्पक्ष फैसला नहीं हुआ, तो न्याय से जनता का भरोसा उठना तय है